January 16, 2009
"कौन - सा प्यार"
कभी
प्यार किया हैं?
कुछ क्षण के लिए ही सही
प्यार किया हैं?
मैं सोचने लगा
किस प्यार की बात की तुमने
लैला - मंजनू की
या
देवदास - पारों की
या
मीरा -कृष्ण की
खैर छोडों !
तुमने जिस भी प्यार की बात की हों
हाँ ! मैंने भी प्यार किया हैं
राधा - कृष्ण की तरह
--- हाँ ! मैंने भी प्यार किया हैं। सबसे हटकर, एकांत में ख़ुद से। राधा - कृष्ण दो थोड़े ही ना थे (हैं)। 27th June 2003 को लिखीं।
December 21, 2008
"मैंने - १" ("मैंने सुँघा हैं")
मैंने सुँघा हैं
धुएँ को
मुँह की बजाय
नाक से
धुआँ
जो दूसरों के फेफडों की सैर कर चुका होता हैं,
उसे मैंने अपने फेफडों की सैर करवाई हैं।
--- इस कविता को मैंने ख़ुद के लिए लिखा हैं। 10th May 2008 को लिखीं।
December 20, 2008
" आँखें "
आज मैं आपको अपनी सबसे पहली कविता (जो की मेरे पास लिखित रूप में हैं) पढ़ने के लिए देता हूँ। शायद यह उतनी अच्छी ना हो। वैसे यह मेरी पहली कविता भी नही हैं, क्यूंकि मैंने इसके पहले भी लिखा था। पर, वो अब मेरे पास नहीं हैं। सो, अब यही मेरी पहली कविता हुई।
कह दो उनसे
बंद कर दे उल्टियाँ,
उनका इनपर कोई
असर नही पड़ता।
ये तो पत्थर हैं
पिघल नहीं सकते
क्यों वक़त अपना
ख़राब करती हैं वो?
ये तो बेअसर
जिए जा रहें हैं,
क्यों ख़ुद को सुखा
रहीं हैं आँखें???
कहीं और दिल
लगा ले वो अपना,
ये अपना दिल
देने से रहें।
--- नई दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित कॉफी होम में लिखी थीं। किसी भिखारी (याची) के लिए संदेश हैं, यह कविता। 19th Aug 2001 को लिखीं।
" माफ़ी चाहिए मुझे "
पिछले बहुत दिनों से मैं यहाँ कुछ लिख नहीं पाया। सच कहु तो दिल में बहुत तम्मना थी की लिखू। पर करता भी क्या, पढ़ाई को लेकर इतना व्यस्त था की समय ही नहीं निकाल पाया। नई जगह और नई पढ़ाई (हाँ, अब मैं SRM Univesity, चेन्नई से M. Tech. (CSE) कर रहा हूँ ।) सो सब कुछ समझ ने में वक़त लगा। और यहाँ नेट की कोई ठीक व्यवस्तता नहीं हैं। कहने को तो रोज शाम में चार बजे के बाद से हमारे कैम्पस में wi-fi on हो जाता हैं। पर वो कम्बखत इतना धीमे चलता हैं, की हम अपना मेल बॉक्स भी नहीं देख पाते हैं। और कुछ करने की बात ही दूर हैं। आज ना जाने कैसे वो ठीक चल रहा हैं। सो, मौका लगते ही मैं यहाँ कुछ लिखने बैठ गया। वैसे, आजकल मेरे पेपर चल रहें हैं।
पहले सोचा की कविता लिखू, पर लगा की क्यों ना दिल की भड़ास पहले निकली जाए। सो, निकाल ली। अब सोचता हूँ की कविता भी लिख ही लू। वरना ना जाने फिर कब यह मौका लगे।
June 25, 2008
सकारात्मक कवितायें
हो सकता हैं कि मैंने जीवन की खूबसूरती को अब तक समझा ही नहीं हो। पर, समझू भी तो कैसे कोई समझाने वाला तो हो। जो कोई भी समझाने आने वाला होता हैं , किसी - ना - किसी बहाने से उसे मुझ से छीन लिया जाता है। अब इसमें मेरी गलती तो हैं नहीं, कि मैंने उन्हें जाने दिया या खो दिया। वो कहते हैं ना कि उपरवाले के आगे किसी की नहीं चलती। मुझे नहीं पता किसी की चलती हैं या नहीं। पर, आज तक मेरी नहीं चली, और मैं चलाना भी नहीं चाहता। क्यूंकि जानता हूँ कि इसमें मेरे ही नुक्सान हैं। और, वैसे भी नुक्सान का सौदा कोई भी नहीं करना चाहता।
खैर छोड़े इन बातों को। हाँ तो मैं कह रहा था कि कविता मेरे लिए भाव कि प्रस्तुति हैं। सच में भाव ही तो हैं जो जीवन जीने की ताकत देते हैं, कम से कम मुझे तो देते ही हैं। बाकियों का मुझे पता नही। भाव अगर ना हो तो कविता बिन जल की मीन के जैसी ही तो हैं। कुछ लोग शायद इसे शब्दों का व्यवस्तित संजोग मानते हैं, तभी तो उनकी कविताओं में भाव नहीं होते। पता नहीं, मेरी कविताओं में भाव होते हैं या नहीं। पर, मेरी पुरी कोशिश रहती हैं कि मेरी कविताओं में भाव हो।
वैसे उन दोस्तों को जिनकी मुझ से शिकायत थी, उनको मैं सिर्फ़ इतना ही कह सकता हूँ की मैं कोशिश करूँगा की उनकी वाली सकारात्मक कवितायें भी लिख सकूँ।
